27 भागों में बँटा आकाश
चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर लगभग 27.3 दिनों में पूरा करता है। पारंपरिक भारतीय ज्योतिष ने आकाश के उस पथ को 27 बराबर भागों में बाँटा और हर भाग को एक नक्षत्र कहा।
हर नक्षत्र 13°20′ (यानी 13 अंश 20 कला) का होता है, और हर नक्षत्र को एक प्रमुख ग्रह से जोड़ा जाता है। इन्हें तारों के समूहों के नाम पर पहचाना जाता है — जैसे अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, और आगे धनिष्ठा तक।
जन्म नक्षत्र कैसे तय होता है
जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वही आपका जन्म नक्षत्र कहलाता है। यह कुंडली की सबसे निजी जानकारियों में से एक माना जाता है — पारंपरिक रूप से इसे नामकरण, विवाह-मिलान और दशा गणना में देखा जाता है।
जन्म नक्षत्र निकालने के लिए जन्म तारीख़, समय और स्थान चाहिए, ताकि चंद्रमा की स्थिति सही निकल सके। बिना समय के भी नक्षत्र बन जाता है, लेकिन अंतर संभव है इसलिए हम ऐसी रिपोर्ट 'अनुमानित' कहते हैं।
विंशोत्तरी दशा से रिश्ता
विंशोत्तरी दशा का पूरा चक्र आपके जन्म नक्षत्र से शुरू होता है। हर नक्षत्र का एक स्वामी ग्रह होता है, और उसी ग्रह की दशा जन्म के समय से चल रही मानी जाती है।
इसी वजह से नक्षत्र इतना केंद्रीय है — चंद्रमा की एक स्थिति आगे 120 वर्ष के दशा-काल की दिशा तय कर देती है। हमारी रिपोर्ट में सारी समय-खिड़कियाँ इसी चक्र से निकलती हैं।
विज्ञान और परंपरा
खगोल-विज्ञान के नज़रिए से नक्षत्र आकाश के विभाजन हैं — गणना के लिए उपयोगी और सटीक। लेकिन नक्षत्रों से स्वभाव या भविष्य तय होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
हम नक्षत्र की गणना इसलिए करते हैं क्योंकि वह परंपरागत पद्धति की नींव है — और उसे भविष्य का प्रमाण नहीं मानते।